Live
अकाली-भाजपा शासन के दौरान पंजाब ने नशे की सबसे बड़ी मार झेली: चीमामनोरंजन जगत को बड़ा झटका, अभिनेत्री संचिता उगले का 30 वर्ष की उम्र में निधनबिक्रम सिंह मजीठिया को अदालत से बड़ी राहत, अग्रिम जमानत याचिका मंजूरपंजाब में फिर बढ़ी गर्मी, कई जिलों के लिए येलो अलर्ट जारीभारत की पाकिस्तान पर शानदार जीत, महिला टी-20 विश्व कप का धमाकेदार आगाज़मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने बड़ी मेहनत से पंजाब को काले दौर से बाहर निकाला; अब हमें अच्छे कामों को रुकने नहीं देना चाहिए: अरविंद केजरीवालAAP ने रॉबी कंग को सौंपी नवांशहर की कमान, हलका इंचार्ज किया नियुक्तफ्रांस पहुंचे PM मोदी, भारतीय समुदाय ने किया भव्य स्वागतअकाली-भाजपा शासन के दौरान पंजाब ने नशे की सबसे बड़ी मार झेली: चीमामनोरंजन जगत को बड़ा झटका, अभिनेत्री संचिता उगले का 30 वर्ष की उम्र में निधनबिक्रम सिंह मजीठिया को अदालत से बड़ी राहत, अग्रिम जमानत याचिका मंजूरपंजाब में फिर बढ़ी गर्मी, कई जिलों के लिए येलो अलर्ट जारीभारत की पाकिस्तान पर शानदार जीत, महिला टी-20 विश्व कप का धमाकेदार आगाज़मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने बड़ी मेहनत से पंजाब को काले दौर से बाहर निकाला; अब हमें अच्छे कामों को रुकने नहीं देना चाहिए: अरविंद केजरीवालAAP ने रॉबी कंग को सौंपी नवांशहर की कमान, हलका इंचार्ज किया नियुक्तफ्रांस पहुंचे PM मोदी, भारतीय समुदाय ने किया भव्य स्वागत
Tuesday, 16 June 2026
Menu

Punjab-Haryana High Court ने Advocate की याचिका खारिज की – ‘Judge पर Case Transfer का नहीं है अधिकार’

पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने सोमवार को एक महिला वकील की याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उसने अपने तीन मामलों को एक विशेष जज की अदालत से किसी अन्य अदालत में ट्रांसफर करने की मांग की थी। अदालत ने साफ कहा कि उसके पास ऐसा कोई अधिकार नहीं है और याचिका “ज्यूरिसडिक्शनल लिमिटेशन” (क्षेत्रीय सीमाओं) के चलते खारिज की जाती है।

इस मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस शील नागु और जस्टिस संजीव बेरी की बेंच ने की। याचिका दायर करने वाली 37 वर्षीय महिला वकील अनुसूचित जाति (SC) समुदाय से हैं और उन्होंने अपने आवेदन में आरोप लगाया था कि जिस जज की अदालत में उनके केस चल रहे हैं, वह पहले बार काउंसिल ऑफ पंजाब एंड हरियाणा (BCPH) से जुड़े रहे हैं। यह वही संस्था है जिससे उन्हें पहले उत्पीड़न का सामना करना पड़ा था। ऐसे में उन्हें न्याय मिलने की उम्मीद नहीं है और जज का केस सुनना “न्याय के सिद्धांतों” के खिलाफ है।

क्या था मामला?

महिला वकील ने कोर्ट में कहा कि:

  • 2022 में गुड़गांव में एक डिस्ट्रिक्ट अटॉर्नी ने उनके साथ यौन उत्पीड़न किया।
  • BCPH के कुछ सदस्यों ने उन्हें बार में एंट्री करने से रोका।
  • उनके खिलाफ झूठी शिकायतें की गईं, जिनमें से एक पर कोर्ट ने बाद में लीगल नोटिस को खारिज कर दिया।
  • 22 जुलाई को उनके खिलाफ एक कंटेम्प्ट नोटिस (अवमानना नोटिस) जारी किया गया, जो उन पर दबाव बनाने की कोशिश थी कि वे एक सीनियर पुलिस ऑफिसर के खिलाफ लगाए गए आरोप वापस लें।

उन्होंने अदालत से यह भी अनुरोध किया कि भविष्य में उनके केस भी उस जज की अदालत में ना लगें, जिससे उन्हें न्याय की उम्मीद नहीं।

हाईकोर्ट ने क्या कहा?

कोर्ट ने साफ किया कि:

  • पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के पास अपने भीतर ही मामलों को एक बेंच से दूसरी बेंच में ट्रांसफर करने का कोई अधिकार नहीं है
  • यदि याचिकाकर्ता को किसी जज के फैसले से आपत्ति है, तो वह लेटर पेटेंट अपील (LPA) दायर कर सकती हैं या फिर सीधे सुप्रीम कोर्ट का रुख कर सकती हैं।
  • अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट का काम राज्य सरकार या उसके संस्थानों द्वारा लिए गए फैसलों की वैधता की जांच करना होता है।
  • हाईकोर्ट सिर्फ उन्हीं मामलों में हस्तक्षेप कर सकता है जहां राज्य या उसके अंगों ने कोई गड़बड़ी की हो।

कोर्ट ने कहा,इस कोर्ट के पास किसी केस को किसी दूसरे हाईकोर्ट में ट्रांसफर करने का अधिकार नहीं है। इसके लिए याचिकाकर्ता उपयुक्त मंच पर जा सकती हैं।”

क्या विकल्प बचे हैं याचिकाकर्ता के पास?

कोर्ट ने कहा कि अब याचिकाकर्ता:

  1. LPA (Letter Patent Appeal) फाइल कर सकती हैं अगर उन्हें लगता है कि सिंगल बेंच ने अपने अधिकारों से बाहर जाकर कोई फैसला सुनाया।
  2. सुप्रीम कोर्ट में अपील कर सकती हैं।
  3. अगर उन्हें निष्पक्ष सुनवाई पर संदेह है, तो वे उचित संवैधानिक या विधिक रास्ते अपना सकती हैं।

कोर्ट का निष्कर्ष

कोर्ट ने अंत में कहा:इस याचिका में दखल देने की जरूरत नहीं है। याचिकाकर्ता कानून के तहत जो भी उचित विकल्प है, उसे अपना सकती हैं।”

यह फैसला न्यायपालिका की सीमाओं और प्रक्रियाओं को स्पष्ट करता है, खासकर जब बात जज पर ‘कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट’ के आरोपों की हो। यह भी साफ हुआ कि न्याय पाने के लिए एक वकील के पास कई वैकल्पिक रास्ते उपलब्ध हैं, लेकिन कोर्ट की शक्तियां भी सीमित होती हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *